शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

भरत की व्यथा


भरत की व्यथा 
घनी अंधियारी  काली रात ।
सूझता नहीं हाथ को हाथ ।
घोर सन्नाटा सा है व्याप्त ।
नहीं है वायु भी पर्याप्त ।

नहीं है काबू में अब मन ।
हुआ है  जब से राम गमन ।
भटकते होंगे वन और वन ।
सोंच यह व्याकुल होता मन ।

नगर से बाहर सरयू तीर ।
साधू के वेश में बैठा वीर ।
झरे नयनों से निर्झर नीर।
न जाने कोई  उसकी  पीर ।

न हो जब कोई कार्य विशेष ।
करे तब मन निज हिर्दय प्रवेश ।
रह रह कर उठता है आवेश ।
अभी भी एक बरस है शेष ।

सोंच मन होता वहुत अधीर ।
तोड़ मर्यादा की प्राचीर ।
कहीं नश्तर के जैसी पीर ।
न डाले मेरे  उर को चीर ।

भरत जो नहीं सका पहिचान।
खून की महिमा से अनजान ।
लखन के संकट में थे प्राण ।
भरत को बना रहे निष्प्राण ।   

रक्त का ऐसा है सम्बन्ध ।
बनाता है ऐसा अनुबंध।
भाई पर आये दुःख का फंद ।
भाई नहीं रह सकता निस्पंद ।

नहीं है शेष कोई भी काम ।
सतत है प्रतीक्षा अविराम ।
गए है जब से वन में राम ।
भरत कैसे पाए विश्राम ।

गगन में हुई प्रकाश की वर्ष्टि ।
थम गयी जैसे मानो श्रष्टि ।
भरत के मन ने की जब पुष्टि ।
गड़ा दी आसमान में द्रष्टि ।

कर रहा नील गगन को लाल ।
हाथ में पर्वत लिए विशाल ।
आकृति में  लगता था विकराल ।
गति मानो मायाबी चाल  ।

न हो भैया को कुछ नुकसान ।
आकृति को राक्षस जैसा जान ।
लक्ष्य पर लिया निशाना तान ।
भरत ने किया वाण संघान ।

लगा जब कपि को जाकर तीर ।
हुई तब उसको भीषण पीर ।
तुरंत ही मूर्क्षित हुआ शरीर ।
गिरा फिर आहत हो कर वीर ।

कहा गिरते गिरते श्री राम ।
भरत को अचरज हुआ महान ।
गए जब परिचय कपि का जान ।
कहा तब क्षमा करो हनुमान  ।

लखन को लगा शक्ति का वाण ।
इसलिए संकट में है प्राण ।
हो रहा है प्रभात का भान ।
अतः अब विदा करो श्रीमान ।

भरत तब बोले हे हनुमान।
मुझे है राम चरण की आन ।
लखन तक तुरत करो प्रयाण ।
बैठ जाओ तुम मेरे वाण ।

कहा तब हाथ जोड़ हनुमान ।
हर्दय में सदा वसत है राम ।
पहुँच जाऊँगा लेकर नाम ।
राम से बड़ा राम का नाम ।

भरत ने कहा सुनो हनुमान ।
कर रहे पूर्ण राम के काम ।
आज मै भेद गया ये जान ।
भक्त के वश में क्यों भगवान् ।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

.आँसू


आँसू

तमन्ना है तुम्हारी आँख का आँसू मैं बन जाऊ .
तेरे दामन को भिगो दूं उसी में ज़ज़्ब हो जाऊ.

जन्म लूँ आँख में तेरी बहू मैं गाल पे तेरे.
तेरे होठो को छू लूँ मैं होंठ छूते ही मर जाऊ
तमन्ना है तुम्हारी आँख का आँसू मैं बन जाऊ . 

कभी मोती सा चमकूँ मै कभी पलकों  में खो जाऊ . 
सदा गम में ही नहीं खुशियों में भी ऑंखें भिगो जाऊ .
तमन्ना है तुम्हारी आँख का आँसू मैं बन जाऊ . 


अगर मैं आँख में निकलू नज़ारे धुँधले हो जाए .
मुझे ही देख पाओ तुम तुम्हें मैं ही नज़र आऊ.
तमन्ना है तुम्हारी आँख का आँसू मैं बन जाऊ .

कभी ऐसा भी हो निकलू तो पलकें बंद तुम कर लो.
अंधेरा हो घना और मैं सुख की नींद सो जाऊ .
तमन्ना है तुम्हारी आँख का आँसू मैं बन जाऊ .